241. वो अंजानी रहो से नजाने,
कहा दिल के रास्ते गुजर जाते है,
जब भी आँखे बंद करते है,
उन्हें अपने सामने ही पाते है|
Author - Vikash soni *
242. अरे रोशन हो गया क्या,
मोहब्बत से तुम्हरा घर,
या तुमने भी मेरी तरह,
खंडरों से मोहब्बत कर ली |
Author - Vikash soni *
243. सुना है बंद घड़ी दिन में दो दफा सही वक़्त दिखाती है,
मगर हम देख नहीं पाते,
कमबख्त मेरे महबूब की याद मुझे इतना सताती है,
फिर भी वो जगाती है सुलाती है,
इतनी नज़ाकत से वो अपना फ़र्ज निभाती है|
Author - Vikash soni *
244. बहारे जन्नत जरा तुम देख लो,
नजाने कब तुम्हारे नसीब में फिर वो आएगी,
वैसे तो जिंदगी कुर्बत है तुम्हारी,
नजाने कब वो तुम्हें इतनी फुर्सत दिखाएगी |
Author - Vikash soni *
245. हमने मोहब्बत भी इतनी मोहब्बत से की,
के मोहब्बत को भी हमसे मोहब्बत हो गई |
Author - Vikash soni*
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