126. बता जिंदगी, वो किताब का पन्ना कहा है,
जिसमें मेरा इंसाफ लिखा है,
सिर्फ नुकसान दिखाया तुने,
बता मेरा भायदा कहा है |
Author- Vikash soni *
127. ऐसे ना छेड़ कुदरत को,ये नदान इंसान
अगर कही वो बिगड़ गई,तो नजाने तुम्हारी,
कितनी पुस्ते तभा कर देगी |
Author- Vikash soni *
128.जिन्होंने सिंहसान से उतरकर, कभी दरबार तक देखा नहीं
वो आज सड़को पर,सारे आम महफ़िलो में, सुमार हो रहे है
जिन्होंने वर्षो तक,संभाल के रखा अपना तख्त ओ ताज
वो ही आज सारे आम सड़को पर नीलाम हो रहे है |
Author- Vikash soni*
129.अब मेरे पास बचा ही क्या, जिसे हम बचा लेगे
हमारी खता ही क्या,जिसे हम छुपा लेगे,
हम हारे भी तो, इश्क के खेल में,
उसमें हमें मिला ही क्या, जिसे हम लुटा देंगे |
Author- Vikash soni *
130. पता नहीं,पाप पुण्य करके किसे क्या मिला है,
किसे क्या पता,कि उसके आने वाले कल में क्या लिखा है,
में बस इतना जानता हूँ कि,
अपने गलत किये कर्मों पर, एक दिन पछताना ही है,
तुम चाहे छुपकर करलो कितने ही बुरे काम
पाप का घड़ा एक दिन भर जाना ही है |
Author- Vikash soni*

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