कविता - 9 शीर्षक - " अंतर्मन”
गैरों की बात नहीं, तुम क्या अपनी बात करते हो,
क्या अपने अंतर्मन पर, तुम विश्वास करते हो,
तुम विश्वास करते हो तो, क्यों दुनिया से डरते हो,
जब में तेरे अंदर हूँ, तो क्यों किसी और से आस रखते हो,
में तुम को जान गया अब, क्या तुम खुद को जाने हो,
अपनी मर्ज़ी के क्या तुम, सच में, खुद के खुद से मालिक हो,
अपने बीते कल की बाते मुझको, रोज़ कई सुनाते हो,
अपने आने वाले कल की बाते, बड़ी खूब बनाते हो,
ना जाने तुम अपने अंदर, कितने तूफा पाले हो,
गलती करके पछताते हो, क्या कभी मेरी बात तुम माने हो,
फिर भी में तेरा दर्पण हूँ, में तेरा अंतर्मन हूं, तुझे हर रोज़ में बेहलाऊँगा,
जब भी होंगी तेरी आँखें नम, तेरे आंसू पोछ जाऊंगा,
क्योंकि में तेरी सलामती का मंतर हूं, में तो तेरा अंतर्मन हूँ |
Author - Vikash Soni

No comments:
Post a Comment